Heritage and glory of Bikaner
Bikaner is also known as the camel city of rajasthan. Founder
The river Saraswati was also considered to be the flow site of the Kolayat, western region of Bikaner, which was famous as Jangal Pradesh in ancient times, which later became extinct.
It would be rare to find another example of love and harmony with people of all religions, castes, religions within Prakote, and the festival of Akshaya Dwitiya and Tritiya on Bikaner Foundation Day gives an accurate message of communal harmony.
![]() |
| junagadh fort bikaner |
Chintamani Jain Temple, Bhandanshah Jain Temple, Laxminath Temple, Devi Naganechiji Temple are witness to religious traditions, the Havelis of Rampuria, Junagadh Fort, Lalgarh Palace, Gajner Palace, Laxmi Niwas Devikund Sagar, symbol of princely splendor here.
The artistic Kundan Meena, inlay jewelery is popular in many countries of the world. The faith of this temple is that the people of the city dedicate their actions to Lakshminathji and see the principle of Gita's impeccable work in their lives.
The ancient city is situated inside the park, the princely kings to protect the city. Parkota was built. Bikaner is an important district on the international border of the country.
बीकानेर : लोक संस्कृति में बिखरे अनगिनत रंग
जोधपुर के राव जोधा के पुत्र राव बीका ने विक्रम संवत् 1545 में अक्षया द्वितीया (ईस्वी 13 अप्रेल1488) के दिन रेतीले धोरों के बीच इस नगर की नींव रखी। प्राचीन काल में जांगल प्रदेश के रूप में विख्यात रहे बीकानेर के पश्चिमी क्षेत्र कोलायत में सरस्वती नदी का प्रवाह स्थल भी माना जाता था, जो कालांतर में विलुप्त हो गई।
रियासतकाल में बीकानेर पर अनेक राजाओं ने शासन किया। आजादी के बाद यहां के शासक सार्दुल सिंह के समय बीकानेर का विलय राजस्थान में हो गया। बीकानेर की खूबसूरती केवल पत्थरों सेे नहीं झलकती, बल्कि यहाँ की लोक संस्कृति में बिखरे अनगिनत रंग इस शहर को कुछ अलहदा सा अंदाज देते हैं।
सांप्रदायिक सौहार्द को समेटे इतना खूबसूरत शहर पूरी दुनिया में शायद ही कोई मिल सके। परकोटे के भीतर हर धर्म ,जाति, मजहब के लोग जिस प्रेम और समरसता के साथ सदियों से रहते आए हैं, ऐसी कोई दूसरी मिसाल मिलना दुर्लभ ही होगा बीकानेर स्थापना दिवस पर अक्षया द्वितीया व तृतीया का पर्व तो साम्प्रदायिक सौहार्द का सटीक संदेश देता है। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई व अन्य सभी मजहबों के लोग एक साथ मिलकर पतंगबाजी करते हैं, घरों में इमली का पना (इमलानी) गेहूं, बाजरी, मूंग व मोठ का खीचड़ा, चार फोल्ड के फुल्के (रोटियां) और हरी पत्तियों की चंदलिए की सब्जी बनाकर बड़े चाव से खाते हैं।
हवेलियों, किलों और देवालयों का शहर
हजार हवेलियों के शहर के रूप में विख्यात इस शहर में सैंकड़ों मंदिर और देवालय है। चिंतामणि जैन मंदिर, भांडाशाह जैन मंदिर, लक्ष्मीनाथ मंदिर, देवी नागणेचीजी मंदिर धार्मिक परम्पराओं के साक्षी हैं, तो रामपुरिया की हवेलियां, जूनागढ़ किला, लालगढ़ पैलेस, गजनेर पैलेस, लक्ष्मी निवास देवीकुण्ड सागर, यहां रियासतकालीन वैभव के प्रतीक है। वहीं हेरिटैज वाॅक नए पर्यटन इवेंट के रूप में प्रचलित हुआ है।
बीकानेर की लघु चित्रकला व ऊंट की खाल पर सुनहरी चित्रकारी शैली (उस्ता कला) का भी कोई सानी नहीं है। चित्रकला की इन शैलियों को सीखने के लिए जापान, अमेरिका सहित विश्व के अनेक देशों से कला विद्यार्थी आते हैं। मुस्लिम उस्ता कलाकारों द्वारा ऊंट की खाल पर उकेरे जाने वाली सुनहरी कलम की कारीगरी मंदिरों, मस्जिदों, शहर की हवेलियों, जूनागढ़ किले, लालगढ़ व गजनेर पैलेस सहित विभिन्न स्थानों को एक अलग खूबसूरती के साथ प्रस्तुत करती है। मुस्लिम चूनगरों की आलागीला पर चित्रकारी, मथैरण कलाकारों की भित्ति चित्रकारी व गणगौर की प्रतिमाओं पर चित्रांकन देखते ही बनता हैं। बीकानेर की स्वर्णकारी कला भी लोकप्रिय है। यहां के कलात्मक कुंदन मीना, जड़ाई के आभूषण विश्व के अनेक देशों में लोकप्रिय हैं।
स्थापत्य, चित्र शैलियों के साथ बीकानेर साहित्यक रूप से भी समृद्ध शहर है। रियासल काल में पृथ्वीराज राठौड़ द्वारा रचित ज्ज्वेलि कृष्ण रुक्मणी री राजस्थानी साहित्य का सिरमौर ग्रंथ हैं वहीं अनूप विवेक, काम प्रबोध, संगीत अनूपांकुश, अनूप संगीत विलास जैसे ग्रंथ यहां के समृद्ध साहित्यिक परंपरा के द्योतक है। जैन, चारणों व भाटों का भी इस परंपरा को समृद्ध बनाने में विशेष योगदान रहा है। इन्हीं साहित्यिक परम्पराओं के फलस्वरूप आज बीकानेर के अभय जैन ग्रंथालय, बड़ा उपासरा, राजस्थान राज्य अभिलेखागार, गंगा गोल्डन म्यूजियम, अनूप लाइब्रेरी आदि में साहित्य का खजाना विद्यमान है। पद्मश्री अल्लाह जिलाई बाई ने राजस्थानी मांड गायकी को लंदन के अल्बर्ट हाॅल तक में गूंजायमान कर शहर की शोहरत को बढ़ाया।
बीकानेर की धरा पर कपिल मुनि, गुरु जम्भेश्वर, आचार्य तुलसी जैसे संतों ने अहिंसा, त्याग, दया और परोपकार जैसे मानवीय मूल्यों की प्रतिस्थापना की और मानवता की सेवा का संदेश दिया। सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि की तपोभूमि कोलायत, चूहों की देवी के रूप में विश्व विख्यात श्रीकरणी माता मंदिर, बिश्नोई सम्प्रदाय के प्रवर्तक गुरू जम्भेश्वर का समाधि स्थल मुुुुकाम और अणुव्रत के प्रवर्तक जैन मुनि आचार्य तुलसी की बीकानेर स्थित समाधि शक्ति स्थल आज भी लाखों लोगों की श्रद्धा का केन्द्र है। नगर सेठ के रूप में विख्यात लक्ष्मीनाथ जी का मंदिर शहर के हृदय स्थल में स्थित है इस मंदिर की आस्था का परवान यह है कि शहरवासी अपने कर्म लक्ष्मीनाथ जी को समर्पित कर गीता के निष्काम कर्म के सिद्धांत को अपने जीवन में साकार करते नजर आते हैं। नगर सेठ की यह परंपरा यहां के लोगों को मोह, माया, क्रोध, लोभ जैसे दुर्गुणों से दूर कर नर सेवा ही नारायण सेवा के मंत्र के करीब लाती है।प्राचीन शहर परकोटे के अंदर बसा है, रियासत के राजाओं ने शहर की रक्षा के लिए परकोटा बनवाया था। परकोटे में पांच दरवाजे व आठ बारियां हैं। शहर की बढ़ती आबादी के मद्देनजर आने जाने के लिए स्वरूप में बदलाव करते हुए कुछ दरवाजों के दोनों और दो-दो दरवाजे और बना दिए गए। शहर के हृदय स्थल पर लाल पत्थर से निर्मित कोटगेट के तीन दरवाजों का स्वरूप ज्यों का त्यों है। समय के साथ-साथ शहर की आबादी बढ़ी और इसके चलते बाहरी इलाकों में नई काॅलोनियां बस गई।
सामरिक दृष्टि से भी बीकानेर देश की अंतराष्ट्रीय सीमा पर स्थित एक अहम जिला है। पाकिस्तान के साथ 168 किलोमीटर की सीमा साझा होने के मद्देनजर यहां बीएसएफ, वायुसेना स्टेशन है। समय समय पर यहां होने वाले युद्धाभ्यास के कारण भी यह अन्तर्राष्ट्रीय सुर्खियों में बना रहता है। लोक संस्कृति, एतिहासिक वैभव, भौगोलिक परिदृश्य और धार्मिक आस्थाओं के केन्द्र के कारण बीकानेर वैश्विक पटल पर पर्यटन के अहम बिंदु के तौर पर उभरा है पिछले कुछ वर्षों से यहां आयोजित हो रहे ऊंट उत्सव ने बीकानेर को दुनिया भर के पर्यटकों के बीच एक नए तीर्थ के रूप में स्थापित किया है। ऐतिहासिक धरोहर के साथ-साथ बीकानेर के आर्थिक परिदृश्य ने भी देशभर में अलग पहचान बनाई है।
यहां बने पापड़ व भुजिया, रसगुल्ला का स्वाद सुदूर देशों तक पहुंचता है। बीकानेर रेल, बस और हवाई मार्ग से देश दुनिया से जुड़ चुका है। राष्ट्रीय राजमार्ग 15, 11, और 89 यहां से होकर निकलते हैं। विकास की यह डगर बीकानेर को एक नई पहचान दिलाने के लिए आतुर है। आमजन के विकास में आमजन की भागीदारी के मंत्र के साथ जिला प्रशासन एक समन्वय इकाई के रूप में तत्परता से जुटा है।
पूरा विश्व आज जब कोरोना संकट से जूझ रहा है तब बीकानेर वासियों ने एकजुटता दिखता हुए लाॅकडाउन के नियमों की अनुपालना की और प्रशासन का पूरा सहयोग किया। संकट की घड़ी में यह एकजुटता प्रशंसनीय है। संकटकाल में जरुरत मंद की मदद यहां के भाााममशाह से लेकर आमजन की प्रकृति रही है।
नगर सेठ लक्ष्मी नाथजी परम्परा का निर्वाह करते नगरवासी समाज की जरूरत के समय अपना तन मन और धन अर्पण करने में कभी पीछे नहीं रहे हैं।

No comments:
Post a Comment
If you have any doubt, Please let me Know.